इस बार जब घर से निकली तो आदरणीय दादाजी की सिर्फ तस्वीर को ही प्रणाम किया और कितना चाहा कि आशीर्वाद देते हुई वो आवाज़ फिर एक बार को कहीं से सुनाई दे जाए लेकिन निराशा ही हाथ  लगी। अब जब भी  घर जाती हूँ तो तो प्यार से “मम्मू ”  कहने वाला कोई नही होता और न ही मेरी ज़ोइ को अब कोई जयश्री नाम से बुलाता है क्योकि हम दोनों को इन खास नामों से सिर्फ दायजी बुलाते थे।

जीवन का सबसे सुनहरा अध्याय बचपन और उस अध्याय की सबसे सुहानी याद दादा-दादी। आज एकल परिवारों में बड़े होते बच्चों को देखकर लगता है कि सच में हम कितने खुश नसीब थे जो हम भरे पूरे परिवार में बड़े हुए। ध्यान मुद्रा, गायत्री मंत्र और न जाने कितने श्लोक  दायजी ने कितना कुछ हमें खेल खेल में ही सीखा दिया था। मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है जब भी कथा से लौटते तो प्रसाद लाते थे और मुझे कहते आंख बंद करो विट्ठल जी से पेड़ा (मिठाई) मांगों, और जैसे ही में आंख बंद करती वो मेरे हाथों में वो पेड़ा रख देते। इतनी छोटी उम्र में उन्होंने कितनी आसानी से हमें ये सिखाया की सच्चे मन से इश्वर से जो मांगो वो मिलता है। नियम से रोज़ भोजन के वक़्त भोग लगाते थे और आखिर में ‘ अन्नपूर्णा माँ की जय हो, अन्नदाता सुखीभव’   कहना कभी नही भूलते थे’।  दिल से आशीर्वाद देते थे वो और कर्म फल मिले न मिले मेरा मानना ही आशीर्वाद हमेशा फलता है। पूरे पंडित परिवार के लिए उनके आशीर्वाद फल रहा है।
उन्होंने हमेशा हमें आगे बढ़ने और अच्छा पढ़ने लिखने के लिए प्रेरित किया । हमारी छोटी से छोटी उपलब्धी भी उनके लिए बहुत बढ़ी होती थी। क्लास में हमेशा फर्स्ट आती तो तो हमेशा कहते “म्हारी छोरी कलेक्टर बनेगी” । मैं कलेक्टर तो नही बन पाई लेकिन जो भी   अर्जित  किया व उनको सपनों  को पूरा कर पाई   इस बात का  संतोष  है। सिर्फ परिवार ही नही अपने से जुड़े हर हर व्यक्ति की मदद के लिए वो जो कर पाए वो उन्होंने किया। जनकल्याण की भावना उनमे नैसर्गिक थी। । वो अपने समय के प्रसिद्ध भागवतवक्ता,कथावाचक और पुरोहित रहे। गीता के श्लोकों, पुरातन ग्रंथ कथाओं व मंत्रोच्चार में उन्हें महारत हासिल थी।  ये ज्ञान ही दायजी के व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाता था। दायजी की लोकप्रियता का ये आलम था कि अभी कुछ वर्षों पहले तक भी लोग उनसे आकर अनुरोध करते थे कि पंडितजी हमें आप से ही पूजन करवानी है और अस्सी की उम्र में भी दायजी ने अपने कईं यजमानों का मान रखने के लिए  पूजा- पाठ करवाया।  उनकी माताजी अर्थात मेरे  पिताजी  की दादीजी ने 103 वर्ष की आयु में अपनी देह त्यागी। उस वक़्त दायजी की उम्र कुछ सत्तर बरस रही होगी। उस उम्र में में उन्होंने जिस निष्ठा भाव सेवा से अपनी माताजी की सेवा की वो निश्चित ही अनुकरणीय है। चार बेटे-बहुओं के होते हुए भी जीजी की सुबह की चाय से लेकर रात की दवाई तक का पूरा ध्यान दायजी स्वयं रखते थे। पूछो तो कहते है ‘ म्हारी बई  है बेटा हूँ नी करूँगा तो कुंण करेगा” । गांव की पृष्ठभूमि से आने के बावजूद वो काफी खुले विचारों के थे। बहुओं को उन्होंने बेटियों की तरह रखा, उचित सम्मान और सही समय पर भोजन के अलावा उनकी और कोई अपेक्षा नही थी। उनकी सभी पोतियों ने स्नातक की शिक्षा प्राप्त की । हमने कभी उन्हें लड़के-लड़की में भेदभाव वाली की बात करते नही सुना, हाँ उन्हें सभी के विवाह की बहुत चिंता थी । ‘ तमारे विदा करी ने फेर जऊँगा’ और उन्होंने अपनी बात रखी , वो अपनी आठों पोतियों को विदा कर उनका संपन्न घर-संसार देखने के बाद  ही विदा हुए।
वो हमारे जीवन के पथ प्रदर्शक दीपक थे जो अब आसमां के सितारे बन गए हैं और हमें पूरा यकीं हैं उस लोक से भी उनका आशीर्वाद और मार्गदर्शन हमें सदा मिलता रहेगा। उनकी स्मृति को नमन ।